रावण का जन्म कब और कैसे हुआ?

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि रावण पुलत्स्य मुनि के पुत्र महर्षि विश्रवा और कैकसी नामक राक्षसी का पुत्र था। रावण की कहानी समुद्र मंथन से शुरू होती है। जब देवतागण समुद्र मंथन से निकाले गए अमृत को पीकर राक्षसों को हर युद्ध में पराजित करने लगे, तो राक्षसों को चिंता होने लगी कि उनका पूरा कुल समाप्त हो जाएगा और राक्षसों का साम्राज्‍य समाप्त हो जायेगा। सभी राक्षसों जाती ने सबसे पहले इस बात पर सहमति बनाई गयी कि उनकी पुत्री एक ब्राह्मण को जन्म देगी जो राक्षसों के कहने पर देवताओं के साथ युद्ध करके उन्हें हरा सके।

यही सोचकर राक्षस राज सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी से कहा, “अब तुम विवाह योग्‍य हो चुकी हो।” मेरे भय की वजह से कोई सुयोग्‍य तुम्‍हारा हाथ मांगने मेरे पास नहीं आता। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम महापराक्रमी ऋषि विश्रवा से शादी करो और एक वीर और तेजस्वी पुत्र को जन्म दो।” जिसे राक्षस वंश के कल्‍याण हो सके।

कैकसी ने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए। वह अपने पिता की आज्ञा मानकर पालात से पृथ्वी पर ऋषि विश्रवा से मिलने चली गई। कैकसी को पृथ्वीलोक तक पहुंचने में बहुत समय लगा, इसलिए वह शाम को दोनों समय मिलने पर ऋषि विश्रवा के आश्रम पहुंची। यहां पहुंचने पर कैकसी ने ऋषि विश्रवा के पैर छूते हुए अपनी इच्छा बताई।

ऋषि विश्रवा ने कैकसी की बात सुनकर उससे शादी करने को भी तैयार हो गए, लेकिन वे कैकसी को भी बताया कि वह शाम की बेला में उनके पास आई थी। यही कारण है कि मेरे दोनों पुत्र क्रूर और बुरे होंगे और राक्षसों की तरह बलवान होंगे, लेकिन मेरा तीसरा पुत्र मेरी तरह धार्मिक होगा। ऋषि विश्रवा और कैकसी ने रावण, कुंभकर्ण और सूपर्णखा को जन्म दिया । धर्मात्मा विभीषण सबसे अंतिम और तीसरे पुत्र था।

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