नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघण्‍टा की पूजा में लाल रंग का खास महत्व क्यों है?

नवरात्रि का तीसरा दिन मां चंद्रघण्‍टा को समर्पित है मां का यह स्वरूप बहुत तेजमयी और शक्तिशाली माना  जाता है। मां के इस रूप को चंद्रघंटा कहा जाता है। क्योंकि उसके मस्तिष्क पर अर्द्धचंद्र के आकार का घंटा  शोभित है।

आइये नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजाविधि, मंत्र और प्रसाद के बारे में जानते है ।

मां चंद्रघण्‍टा की पूजाविधि:

तीसरे दिन नवरात्रि के ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर लेना चाइये, फिर पूजास्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र कर लें। उसके माता दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित करें और उसके बाद माँ चंद्रघण्‍टा स्‍वरूप का स्‍मरण करें घी के पांच दीपक जलाएं, फिर मां को गुड़हल के फूल और लाल गुलाब समर्पित करे । फूल चढ़ाने के बाद रोली, अक्षत और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाएं और मां चंद्रघण्‍टा का मंत्र पढ़ें। तब घी और कपूर के दीपक से माता की आरती उतारे और पूरे घर में शंख और घंटे बजाएं। पूजा के दौरान शंख और घंटी का प्रयोग करने से वातावरण में शुभ ऊर्जा पैदा होती है और बुरी ऊर्जा दूर होती है। पूजा के बाद मां को केसर की खीर दीजिए और क्षमा प्रार्थना करके पूजा समाप्त कर दें। यदि आप पूजा के बाद दुर्गा माता की कहानी, दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती पढ़ते हैं, तो आप पूरे फल प्राप्त करेंगे।

नवरात्रि के तीसरे दिन दुर्गा माता के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघण्‍टा की पूजा की जाती है। देवी भागवत पुराण में कहा गया है कि मां दुर्गा का यह रूप शांति और सुख प्रदान करता है। ऐसी मान्यता है कि मां चंद्रघण्‍टा देवी की पूजा करने से आपका बल और प्रभाव बढ़ता है और आप समाज में अधिक प्रभावशाली बनते हैं। देवी का यह रूप आत्मविश्वास बढ़ाता है।

आइए नवरात्रि के तीसरे दिन आपको बताते हैं कि कैसे मां चंद्रघण्‍टा की पूजा की जाती है, उसके मंत्र और उनका नाम क्यों चंद्रघण्‍टा रखा गया है।

माना जाता है कि मां दुर्गा का यह स्वरूप अद्भुत शक्तिशाली और तेजस्वी है। देवी का नाम चंद्रघंटा है क्योंकि माता के मस्तक पर अर्द्धचंद्र के आका का घंटा है। नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह उठकर मां के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। लाल और पीले फूल मां की पूजा में प्रयोग किए जाते हैं। मां चंद्रघण्‍टा की पूजा में शंख और घंटों का उपयोग करने से माँ प्रसन्न होती हैं और पूजा करने वाले की हर इच्छा को पूरी करती हैं।

मां चंद्रघण्‍टा का रूप सवरूप क्या है

मां चंद्रघण्‍टा का वाहन सिंह है और उनकी अष्‍ट भुजाओं का रंग स्वर्ण के समान चमकदार है। उसकी भुजाओं में कमल, धनुष, बाण, खड्ग, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र और शस्त्र हैं। उनके सिर पर रत्‍नजड़ित मुकुट और गले में सफेद फूलों की माला है। मां चंद्रघण्‍टा सदैव युद्ध मुद्रा में रहती हैं और मणिपुर चक्र को तंत्र साधना में नियंत्रित करती हैं।

मां चंद्रघण्‍टा का पूजा मंत्र:-

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥

मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
रंग, गदा, त्रिशूल,चापचर,पदम् कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

मां चंद्रघण्‍टा का भोग:

माना जाता है कि नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघण्‍टा की पूजा में केसर की बनी खीर का भोग लगाना सबसे अच्छा माना जाता है । दूध से बनाई गई मिठाइयां से माँ को भोग लगाने की परंपरा है। आप दूध की बर्फी और पेड़े का भी माँ को भोग लगा सकते हो।

लाल रंग का महत्‍व:

लाल कपड़े पहनकर मां चंद्रघण् टा की पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है। लाल रंग वृद्धि और शक्ति का प्रतीक है। इस रंग के वस्त्र धारण करने से आपकी संपत्ति और परिवार में संपन्नता बढ़ती है।

मां चंद्रघण्‍टा की आरती:

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।

चंद्र समान तुम शीतल दाती।
चंद्र तेज किरणों में समाती।

क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली।

मन की मालक मन भाती हो।
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।

सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट मे बचाने वाली।

हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।

मूर्ति चंद्र आकार बनाएं।
सन्मुख घी की ज्योत जलाएं।

शीश झुका कहे मन की बाता।
पूर्ण आस करो जगदाता।

कांची पुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटू महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी।

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